रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च। मॉस्को पैट्रियार्कट।
विभिन्न भाषाओं में मिशनरी साहित्य का पुस्तकालय।
धर्मसभा के मिशनरी विभाग की परियोजना “ऑर्थोडॉक्स ट्रांसलेटर”।
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जीवन का अर्थ किस में है?

यह सवाल शायद हर आदमी ने कर दिया है। हम काम में, परिवार में, सर्जत्मकता में, यात्रा में, ग्यान में उत्तर की तलाश करते हैं। अकसर यह तलाश भूलभुलैया में भटकने जैसेः मालूम लगता है कि अंत में उत्तर यही है। लेकिन समय निकलता है और हम एक और बार अकथनीय उदासी महसूस करते हैं, भवना कि असली बात अभी बाकि या पास है पर हम उसको खोते हैं।

ईसाई दृष्टि से यह भावना ना संयोग है, ना निराशा का कारण है। यह हमारे मन की धीमी आवाज़ है जो अपने रचयिता को याद करता है। ईश्वर ने हमें अनंतता और असीम प्रेम के लिए बनाया है, और जब तक हम इसे प्राप्त नहीं करते, हमारा हृदय इस क्षणभंगुर और परिवर्तनशील संसार में पूर्ण शांति की खोज करता रहेगा और नहीं पा सकेगा।

तो अर्थ किस में है? उत्तर जो हमें सुसमाचार देता है, वह आश्चर्यजनक रूप से सरल और गहन एक साथ है। जीवन का अर्थ — वास्तविक, शाश्वत सुख की प्राप्ति में है, जो ईश्वर के साथ जीवन है। इस सुख की दो विमाएँ हैं: हमारी सांसारिक यात्रा और हमारा शाश्वत लक्ष्य।

सांसारिक सुख: आज्ञाओं का मार्ग

अक्सर ऐसा लगता है कि धर्मादेशों का पालन करना बंदिशों की एक सूची है, एक तरह का कठोर नियम संहिता, जो जीवन से आनंद छीन लेता है। लेकिन क्या यह ऐसा है? इस पर दूसरी तरह देखिये। ईसा के धर्मादेश निषेध नहीं हैं, बल्कि सृजनहार की एक विशेष 'निर्देशिका' है कि मनुष्य सुख के लिए कैसे बना है।

ईसा कहते हैं: «मैं इसलिए आया कि वे जीवन पाएँ और बहुतायत से पाएँ» (यूहन्ना का सुसमाचार, १०:१०)। वे हमें नीरस अस्तित्व नहीं, बल्कि एक भरपूर, सार्थक और वास्तविक जीवन प्रदान करते हैं। ईश्वर और पड़ोसी से प्रेम, क्षमा, दया और अनासक्त निर्णय के धर्मादेश — इस जीवन का व्यावहारिक मार्ग हैं।

जब हम ईर्ष्या करते हैं तो क्या होता है? – हम अपने आप को अंदर ही अंदर खा जाते हैं।

जब क्रोधित होते हैं? – रिश्ते तोड़ते हैं और मन में शांति खो देते हैं।

जब निंदा करते हैं? – दूसरे को अपमानित करके स्वयं को ऊँचा करते हैं और लोगों से दूर हो जाते हैं।

ईसा तो एक मार्ग प्रस्तावित करते हैं, जो हमारा मन अभी चंगा करता है। माफ़ करते हुए हम अपकार से स्वतंत्रता पाते हैं। मदद करते हुए, हम असली सुख महसूस करते हैं। हर बात के लिए ईश्वर को धन्यवाद देना सीखते हुए, हम जीवन के तूफ़ानों के बीच भी शांति पाते हैं।

इस प्रकार, हमारे जीवन के सांसारिक हिस्से का अर्थ— प्रेम सीखना है। इस शिष्यता के मार्ग से गुज़रना, जहाँ हम, ठोकर खाते हुए और गिरते हुए, पर ईश्वर की सहायता से फिर उठते हुए, दूसरे मनुष्य में ईश्वर की छवि देखना सीखते हैं, ईश्वर पर भरोसा करना सीखते हैं — सुख में भी और दुख में भी। यही मुख्य बात की तैयारी है।

शाश्वत सुख: प्रेम से भेंट

हमारा सांसारिक जीवन — अनंतता की तैयारी है। एक चिरप्रतीक्शित भेंट अपने सबसे निकट और प्रिय व्यक्ति से, जिससे आपको लंबे समय तक अलग रखा गया था, की कल्पना कीजिए। इस भेंट की सुख —उस आनंद की केवल एक मंद छवि है जो मृत्यु की सीमा के पार इंतज़ार कर रही, यदि व्यक्ति ईश्वर की ओर प्रयासरत था।
शाश्वत सुख केवल किसी सुंदर स्थान पर निश्चिंत अस्तित्व नहीं है। यह ईश्वर के साथ रहने से प्राप्त होने वाली अनंत, सर्वव्यापी आनंद की अवस्था है। संत पिता इस अवस्था को 'देवत्व प्राप्ति' कहते हैं - जब मनुष्य, अपनी व्यक्तिगत व्यक्तित्व रखते, ईश्वर के साथ इतना जुड़ जाता है कि उनकी कृपा, उनके प्रकाश और आनंद से भर जाता है।

प्रेरित पौलुस, जिन्हें ईश्वर ने इस वास्तविकता सच्चाई का दर्शन करने दिया, कहते हैं: «आँख ने देखा नहीं, और कान ने सुना नहीं, और मनुष्य के चित्त मन में भी वे बातें नहीं आईं, जो ईश्वर ने उससे प्रेम रखने वालों के लिये तैयार की हैं» (1 कुरिन्थियों 2:9)। कोई कुछ भी सांसारिक सुख उसकी तुलना नहीं कर सकता जो ईश्वर ने प्यार करने वालों के लिए तैयार किया है।

यही कार्य ईसा हमें दिखाते हैं: «आप पहले ईश्वर के राज्य और सच की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी आप को मिल जाएंगी» (मत्ती 6:33)। वह वादा नहीं करते कि सांसारिक जीवन आसान और निर्मल हो जाएगा। लेकिन वह वादा करते हैं कि यदि हमारे जीवन का मुख्य ध्येय वह स्वयं होंगे और उसके धर्म के अनुसार (अर्थात उसकी धर्मदेशों के अनुसार) जीवन होगा, तो हमें हमारे प्रत्येक दिन का अर्थ, संकटों में सांत्वना और अंततः अनंत काल में वही पूर्ण आनंद प्राप्त होगा।

कैसे इस रास्ता आरंभ किया जा सकता है?

तुरंत अपने सामने असंभव कार्य न रखें। हज़ार किलोमीटर का सफर भी पहले कदम से आरंभ होता है। ऐसा पहला कदम हो सकता है:
  • ईश्वर के लिए एक सच्ची अपील: बस उसके सामने अपना हृदय खोल दें, जैसे अपने सबसे करीबी मित्र के सामने। उसे अपनी खोज, संदेह, खुशियों और दुखों के बारे में बताएं।
  • सुसमाचार का पठन: दिन में कुछ पद से पढ़ने लगें। इसे एक प्राचीन पुस्तक की तरह नहीं, बल्कि एक प्रेमपूर्ण पिता द्वारा आपको व्यक्तिगत रूप से संबोधित पत्र की तरह पढ़ें।
  • प्रेम का एक छोटा सा कार्य: जो उदास है उसे मुस्कुराहट देना, जिसे ज़रूरत है उसकी मदद करना, एक कठोर शब्द कहने से रुक जाना – यह उस सुख की ओर एक कदम है, जिसके बारे में हम बात कर रहे हैं।

जीवन का अर्थ कोई अमूर्त जटिल सिद्धांत नहीं है, बल्कि ईसा से एक भेंट है, जो स्वयं «रास्ता, और सच, और जीवन» (यूहन्ना 14:6) हैं। वह न केवल दिशा दिखाते हैं, बल्कि स्वयं हमारे साथ चलते हैं, इस असली, अनंत सुख के मार्ग पर हमारा सहारा बनते हैं।